जुमअतुल विदा के बारे में एक महत्वपूर्ण संदेश
जुमअतुल विदा के बारे में एक महत्वपूर्ण संदेश
अलविदा (जुमअतुल विदा) की हकीकतبسم الله الرحمن الرحيم
जुमअतुल विदा के बारे में एक महत्वपूर्ण संदेश
काफी लोगों का यह सवाल था कि अलविदा की नमाज़ इस जुमे को यानी 13 मार्च को पढ़ी जाए या 20 मार्च को?
और अगर 13 मार्च को अलविदा की नमाज़ पढ़ ली गई और चाँद 29 को न हुआ तो उसके बाद आने वाला 20 मार्च भी जुमे का दिन होगा, तो फिर क्या किया जाए?
मैंने इस मसले को
Mufti Akhtar Hussain Alimi Qadri
(सदर शुबहा-ए-इफ्ता, दारुल उलूम अलीमिया जमदा शाही बस्ती) की खिदमत में व्हाट्सऐप के जरिए रखा।
हज़रत ने फरमाया कि इसी जुमे यानी 13 मार्च 2026 को जुमअतुल विदा की नमाज़ अदा की जाएगी।
फिर मैंने यही मसला
Mufti Muhammad Mustafa Raza Noori Amjadi
(उस्ताद व मुफ्ती, अमजदी दारुल इफ्ता) की खिदमत में पेश किया।
उन्होंने फरमाया कि आम तौर पर मौजूदा अंदाजों के मुताबिक 13 मार्च 2026 को ही जुमअतुल विदा माना जाएगा।
लेकिन अगर लोगों ने 13 मार्च को जुमअतुल विदा समझकर नमाज़ पढ़ ली और बाद में चाँद नज़र नहीं आया और रमज़ान 30 दिन का हो गया, तो उसके बाद आने वाला जुमे का दिन ही असल रमज़ान का आख़िरी जुमे होगा।
इस हालत में 13 मार्च वाला जुमआ सामान्य जुमआ माना जाएगा और 20 मार्च 2026 को जुमअतुल विदा होगा।
अल्लाह तआला इन बुजुर्गों का साया हम पर कायम रखे और हमें उनकी नसीहतों से फायदा उठाने की तौफीक दे।
आमीन 🤲
लेखक:
अबदुल मुस्तफा कादरी
(खतीब व इमाम, ठूठी बारी, जिला महराजगंज)
अलविदा (जुमअतुल विदा) की हकीकत
जुमअतुल विदा रमज़ान शरीफ के आख़िरी जुमे को कहा जाता है।
यह कोई इस्लामी त्योहार नहीं है। रमज़ान के बाकी जुमों की तरह यह भी एक सामान्य जुमे का दिन है।
कुरआन और हदीस में इसकी कोई अलग खासियत या फज़ीलत नहीं बताई गई है।
चूँकि यह रमज़ान का आख़िरी जुमआ होता है, इसलिए इसे जुमअतुल विदा कहा जाने लगा।
“अलविदा” का मतलब होता है विदाई, यानी रमज़ान का महीना अब रुख्सत होने वाला है, इसलिए इसे जुमअतुल विदा कहा जाता है।
आज के हालात को देखते हुए बेहतर यह है कि इस दिन कोई ऐसा काम या बात न की जाए जिससे लोग यह समझें कि इस जुमे की कोई खास अलग फज़ीलत है।
Ahmed Raza Khan Barelvi
(आला हज़रत) ने भी फतावा रज़विया, जिल्द 8, पेज 455 में यही बात लिखी है।
इसलिए अलविदा कहने के बजाय इसे सिर्फ जुमे का दिन कहना ज्यादा बेहतर है।
और इसके खुत्बे में वही चीजें पढ़ना फर्ज, वाजिब या सुन्नत हैं जो बाकी जुमों के खुत्बों में होती हैं।
कभी-कभी ऐसा होता है कि रमज़ान की 30 तारीख जुमे के दिन पड़ जाती है, तब लोग पूछते हैं कि अलविदा कौन सा जुमआ होगा?
क्योंकि अगर 29 को चाँद हो गया तो रमज़ान खत्म हो जाएगा।
ऐसे सवाल पूछने वाले अक्सर अनपढ़ और कम जानकारी वाले लोग होते हैं।
जब इस जुमे की इस्लाम में कोई अलग खासियत ही नहीं है, तो इसके बारे में पूछने की जरूरत ही क्या है?
📚 (रमज़ान का तोहफा, पेज 40)
— मौलाना तहरीर अहमद रिज़वी बरेलवी

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें